पहाड़ों की रानी को सहेजने वाले गुमनाम शिल्पकार स्वर्गीय छबि लाल की विरासत को सलाम
पहाड़ों की रानी को सहेजने वाले गुमनाम शिल्पकार स्वर्गीय छबि लाल की विरासत को सलाम

विशेष रिपोर्ट | मसूरी_उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसी ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मसूरी के प्रसिद्ध माल रोड और झूला घर के सौंदर्य को निखारने के पीछे स्थानीय शिल्पकार स्वर्गीय छबि लाल का हाथ था। उन्होंने अपनी अद्भुत छेनी और हथौड़े की कला से पत्थरों में जान फूंककर मसूरी के इतिहास को अमर बना दिया।

35 वर्षों की समर्पित नगर पालिका सेवा
वर्ष 1921 में उत्तराखंड की पावन भूमि पर जन्मे छबि लाल का मसूरी से बेहद गहरा जुड़ाव था। वह वर्ष 1951 से 1986 तक (35 वर्ष) मसूरी नगर पालिका में कार्यरत रहे। उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान केवल नौकरी नहीं की, बल्कि मसूरी को एक नई सांस्कृतिक पहचान देने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। वर्ष 1995 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कलाकृतियां आज भी उनके होने का अहसास कराती हैं।

माल रोड का ‘शेर’ और झूला घर का ‘लोक नृत्य’
1950 के दशक में जब मसूरी के सौंदर्यीकरण का काम शुरू हुआ, तब छबि लाल ने कई ऐतिहासिक कृतियों को आकार दिया:
वासु सिनेमा के सामने ‘शेर’ (1956): माल रोड पर वासु सिनेमा के ठीक सामने गढ़ी गई भव्य शेर की कलाकृति आज भी पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण केंद्र है।
झूला घर के सामने ‘उत्तराखंड लोक नृत्य’ (1958): झूला घर के पास बनाई गई यह मूर्ति उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और पारंपरिक नृत्य कला को जीवंत रूप से प्रदर्शित करती है।

समय के थपेड़ों में नष्ट हो गईं कई दुर्लभ कलाकृतियां
स्थानीय इतिहास प्रेमियों और उनके पड़नाती जैनेन्द्र सिंह नेगी के प्रयासों से छबि लाल जी के योगदान को सामने लाया जा रहा है। हालांकि, दुखद पहलू यह भी है कि उनके द्वारा बनाई गई कई अन्य सुंदर कलाकृतियां देखरेख के अभाव में नष्ट हो गईं। इनमें शामिल हैं:
गांधी चौक पर बनी ‘तीन बंदरों’ की कलाकृति।
पिक्चर पैलेस में निर्मित ‘पक्षियों का झुंड’।
माल रोड स्थित ‘तोते की कलाकृति’ और अन्य कई छोटी-बड़ी मूर्तियां।

विरासत और धरोहर को सहेजने की पुकार
आज जब पर्यटक माल रोड पर घूमते हुए इन कलाकृतियों के सामने तस्वीरें खिंचवाते हैं, तो उन्हें इस बात का गर्व होना चाहिए कि इसे उत्तराखंड के ही एक स्थानीय कलाकार ने अपने हाथों से गढ़ा था। स्थानीय निवासियों और इतिहास प्रेमियों की मांग है कि प्रशासन और नई पीढ़ी को इस गुमनाम शिल्पकार की बची हुई धरोहरों को सहेजने के साथ-साथ स्वर्गीय छबि लाल को उचित सम्मान और पहचान देनी चाहिए।

