देहरादून के लेखक गांव में पूर्व केंद्रीय मंत्री से अनेक मामलों पर कुलपति प्रो0 वरखेड़ी ने की चर्चा, कहा-योग और अध्यात्म का संबंध अटूट
देहरादून के लेखक गांव में पूर्व केंद्रीय मंत्री से अनेक मामलों पर कुलपति प्रो0 वरखेड़ी ने की चर्चा, कहा-योग और अध्यात्म का संबंध अटूट
डॉ0 वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल
देहरादून। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 श्रीनिवास वरखेड़ी ने योग और अध्यात्म को अन्योन्याश्रित बताते हुए कहा कि हमारा जीवन योग के बिना संभव नहीं है। कभी कुछ लोग विशेष योग करते हैं, लेकिन हमारा शरीर हमारे न चाहते हुए भी योग क्रियायें करता रहता है। योग हमें मनुष्य होने की उच्च स्थिति तक ले जाने में सहायक है।

प्रो0 वरखेड़ी देहरादून के लेखक गांव में अंततराष्ट्रीय स्पर्श हिमालय महोत्सव-2025 के अंतर्गत ’योग एवं अध्यात्म’ शीर्षक के सत्र में बतौर विशिष्ट अतिथि विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विश्व को योग जैसा दर्शन और ज्ञान भारत ने ही दिया है। हमारा शरीर योग की सबसे बड़ी पाठशाला है। हमारे सभी अंग योग और सहयोग के सबसे बड़े उदाहरण हैं। हमारे सभी अंग एक-दूसरे के साथ मिलकर एक व्यवस्था में कार्य करते हैं, इसी कारण हमारा अस्तित्व बनता है। अध्यात्म के मूल में योग ही है। योग को अध्यात्म से बिल्कुल भी पृथक नहीं किया जा सकता है। सोना, भोजन करना, बोलना, चलना ये हमारे शरीर के सहज भाव हैं। यह ऐसा योग है, जो सहजता से होता है।

कुलपति ने कहा कि भारत के लोगों में योग की वर्षों की तपस्या का फल विद्यमान है। हमारा वोकल कॉर्ड वेदवाणी समेत अनेक ऐसे मंत्रों का उच्चारण कर सकता है, जिसे विदेश के लोग नहीं कर पाते हैं। हम यदि योग के बिना भोग करते हैं तो समस्याओं से घिर जाते हैं। इसलिए हम योग को त्याग ही नहीं सकते।
उन्होंने कहा कि महाभारत में अर्जुन का विषाद भी योग बन गया था। हमारी नई पीढ़ी के विद्यार्थियों मंे विषाद की यह समस्या बड़ा रूप धारण कर रही है। अतः शरीर के साथ मन को भी स्वस्थ रखने के लिए योग और अध्यात्म का होना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि हम भारतीयों का सौभाग्य है कि हमने इस पवित्र भारत भूमि में जन्म लिया है। व्यक्ति के जीवन पर उसके जन्म स्थान और वहां के वातावरण का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति के विचार, दर्शन और विश्वास इससे प्रभावित होते हैं। भारत में स्थिति उत्तराखंड को देवभूमि इसलिए कहा जाता है कि यहां के कण-कण में दैविक शक्तियां विराजमान हैं। यहां की पवित्रता और निश्छलता संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति की अनेक विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत का दर्शन परहित और लोककल्याण का रहा है। हमें सिखाया गया है कि भोग से अधिक सुख त्याग में है। हम अपने सुख और आनंद को एक-दूसरे के साथ बांटते आये हैं। आज की पीढ़ी में इस ’शेयरिंग’ के गुण को विकसित करना बहुत आवश्यक है।
इसके बाद प्रो0 श्रीनिवास वरखेड़ी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमेश पोखरियाल ’निशंक’ से भेंटकर अपनी पुस्तक ’शास्त्रपद्धति’ उन्हें भेंट की। कुलपति और डॉ0 ’निशंक’ ने उच्च शिक्षा और संस्कृत शिक्षा जैसे अनेक मसलों पर गहन चर्चा की। डॉ0 ’निशंक’ ने कुलपति प्रो0 वरखेड़ी से कहा कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय को पांडुलिपियों के संरक्षण, भारतीय ज्ञान परंपरा समेत अनेक मसलों कार्य करना चाहिए। कुलपति ने कहा कि केंद्रीय संस्कृत विश्वद्यालय लेखक गांव में पुस्तकों के रूप में संचित ज्ञान का लाभ प्राप्त करेगा। इसके लिए शीघ्र ही कार्ययोजना बनाई जाएगी। कुलपति ने इसके बाद लेखक गांव का भ्रमण किया। उन्होंने ज्योतिष आधारित एक डिजिटल फ्रेम का डेमो देख इसे विश्वविद्यालय के लिए ज्योतिष विभाग के लिए बहुत उपयोगी बताया। अवसर पर देश-विदेश से आये अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति, निदेशक और विषय विशेषज्ञ उपस्थित थे।
