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भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतःकरण में धारण करे हर भारतीय,बदरीनाथ में विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंतर्राष्टीय सम्मेलन में विद्वानों का आह्वान

भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतःकरण में धारण करे हर भारतीय,बदरीनाथ में विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंतर्राष्टीय सम्मेलन में विद्वानों का आह्वान

देवप्रयाग। भारतीय ज्ञान परंपरा की बदौलत भारत ने विश्वभर में श्रेष्ठ स्थान बनाया है। प्राचीन ज्ञान और संस्कृति के अनुपम भंडार के कारण ही भारत विश्वगुरु जैसे पद पर प्रतिष्ठित हुआ। आज आवश्यकता है कि हर भारतवासी इस परंपरा को अपने में स्थापित करे और इस परंपरा के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए आंतरिक जागरण करे।

यह बात श्री बदरीनाथ धाम में आयोजित अंतर्राष्टीय सम्मेलन में विद्वान वक्ताओं ने कही। तीन दिवसीय इस सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग, सोबनसिंह जीना विश्वविद्यालय अलमोड़ा, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार, देवभूमि चारधार होटल एसोसिएशन, बदरीनाथ होटल एंड लाॅंज एसोसिएशन तथा अग्निमंदिरम, जोधपुर राजस्थान की ओर से किया जा रहा है।

दीपप्रज्वलन के साथ आरंभ हुए कार्यक्रम में मुख्य अतिथि योगी बालकदास महाराज महंत खाकचैक आश्रम ने कहा कि भारत का वैदिक ज्ञान आज विश्वभर में अलग-अलग रूपों मंे प्रचलित है। हमारे ज्ञान का आधार विज्ञान ही हैं। भारतीय प्राचीन विद्याएं विज्ञान की कसौटी पर शतप्रतिशत खरी हैं। अंग्रेजों ने हमारी ज्ञान परंपरा को यद्यपि बाधित किया, परंतु अनेक थपेड़े झेलने के बाद भी हमारी यह परंपरा अक्षुण्ण है। इसलिए हर भारतीय इस परंपरा पर गर्व करता है।

बतौर सारस्वत अतिथि श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के निदेशक प्रो0 पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रों में सुरक्षित तो है ही, परंतु यह हर भारतीय के हृदय में भी विराजमान है। इस परंपरा ने समय-समय पर विश्वसंकट से भी छुटकारा दिलाने का काम किया है। इसके विषिष्ट गुणों के कारण ही आज पूरा विश्व इसके प्रति आकर्षित होकर उसे अपना रहा है। प्रो0 सुब्रह्मण्यम ने कहा कि यह परंपरा मनुष्य के इहलौकिक और परलौकिक मार्गों को सुदृढ़ और निर्बाध बनाती है। भारत सरकार इस परंपरा के व्यापक’-प्रसार का कार्य कर रही है। नई शिक्षा नीति में इसे विशेष स्थान दिया गया है। इसका पूरा प्रभाव सामने आने में अभी कुछ समय लगेगा। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक ले जाने का दायित्व का हर भारतीय का है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 रमाकांत पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्यापक शोध हो रहे हैं। यह परंपरा हमें मानव होने का अर्थ बतलाती है। इस परंपरा में विश्वमैत्री का भाव समाहित है, जो विश्वशांति और सहिष्णुता का आधार है। प्रो0 पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी संकटमोचक है। यह हमें असस्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। हमारी इस परंपरा को छिन्न-भिन्न करने वाले विदेशियों के मंसूबे कामयाब नहीं हो पाये। तक्षशिक्षा जैसे विश्वविद्यालयों के ग्रंथालयों को भले ही जला दिया गया हो, लेकिन फिर भी इस प्राचीन विद्या के ज्ञान का विशाल भंडार सुरक्षित रहा है।

श्री बदरीनाथ धाम के धर्माधिकारी विशंभर सेमवाल ने विश्वविद्यालयों द्वारा इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार में मील का पत्थर बताया। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के पूर्व निदेशक प्रो0 बनमाली विश्वाल ने बतौर विशिष्ट अतिथि कहा कि वर्तमान में संपूर्ण विश्व में व्याप्त ज्ञान का आधार भारतीय ज्ञान परंपरा ही है। इस अवसर पर शोध सामग्री का विमोचन भी किया गया। वक्ताओं ने जनजातीय कर्ण परंपरा के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश मेहता,प्रो0 शैलेश तिवारी, डाॅ0 जनार्दन प्रसाद नौटियाल, डाॅ0 दिनेशचंद्र पांडेय, कृष्णकांत पंत, रजतगौतम छेत्री इत्यादि उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन 15 मई को होगा। संचालन डाॅ0 प्रदीप सेमवाल ने किया।

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