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हिमालय बीमार हुआ तो हम भी स्वस्थ नहीं रह पाएंगे, हिमालय दिवस पर विशेषज्ञों ने पर्यावरण संबंधी चुनौतियों पर की चिंता

हिमालय बीमार हुआ तो हम भी स्वस्थ नहीं रह पाएंगे, हिमालय दिवस पर विशेषज्ञों ने पर्यावरण संबंधी चुनौतियों पर की चिंता

देवप्रयाग। हिमालय दिवस पर पर्यावरण संरक्षण में हिमालय की भूमिका को रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि दिनोंदिन आ रही आपदाएं हिमालय के संकट में होने का संकेत है। प्रकृति को बचाने में हिमालयी क्षेत्र के लोगों की बड़ी भूमिका रही है। पानी,बीज और वृक्षों को बचाने के लिए इसी क्षेत्र में अनेक आंदोलन किए गए हैं।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर, देवप्रयाग और विज्ञान भारती के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में हिमालय का महत्त्व सामरिक दृष्टि के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी है। गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियों का उद्गम यह क्षेत्र जैवविविधता के लिए भी अहम है। देवभूमि विज्ञान समिति के संयोजक प्रो केडी पुरोहित ने कहा कि हिमालय में तीर्थाटन के स्थान पर बढ़ता पर्यटन इस संवेदनशील क्षेत्र के लिए नुकसानदायक है। जगह-जगह फैला प्लास्टिक कचरा यहां की प्रकृति का दुश्मन बन गया है।

विज्ञान भारती के संयुक्त सचिव प्रवीण रामदास ने कहा कि हिमालय हमारी जीवन रेखा है। इसके बीमार होने का मतलब हम भी बीमार हो जाएंगे। हिमालय हमें स्वच्छ हवा, पानी ही नहीं देता, बड़े पैमाने पर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के लिए हम हिमालय पर ही निर्भर हैं। यह हमारे आयुष का भी स्रोत है। हिमालय में खड़ी हो रही पर्यावरणीय चुनौतियां मानवजनित हैं। इस संबंध में बड़ी मुहिम की आवश्यकता है।

हेमवती नंदन गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के पौड़ी परिसर से आए डॉ प्रभाकर प्रसाद बडोनी ने कहा कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति पर्यावरण के साथ घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। यहां की धारा पूजन और फुलवारी जैसी अनेक प्रथाएं पर्यावरण संरक्षण के हित में है। वृक्षों को बचाने के लिए ‘चिपको आंदोलन’ बीजों के लिए ‘बीज बचाओ आंदोलन’ और पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘मैती आंदोलन’ इसी प्रदेश में आरंभ हुए हैं। उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण की पाठशाला है।

विज्ञान भारती के राज्य आयोजन सचिव आशुतोष सिंह और केशव आशीष, वाडिया इंस्टीट्यूट के डा.गौतम रावत तथा डॉ सोमदत्त और एनआईटी श्रीनगर से डा धर्मेंद्र त्रिपाठी ने हिमालय की रक्षा के लिए व्यापक अभियान की आवश्यकता जताई।

अध्यक्षता करते हुए निदेशक प्रो पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि हमारा परिसर संस्कृत, शास्त्र शिक्षण के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। परिसर में 50 प्रजातियों के पौधे रोपे गए हैं। बच्चों ने रक्षा बंधन पर इन पर राखियां बांधी हैं। सिंगल प्लास्टिक का इस्तेमाल यहां प्रतिबंधित है। पूरा प्रयास रहता है कि प्लास्टिक की सामग्री का उपयोग न किया जाए।

इस अवसर पर डॉ अनिल कुमार डॉ शैलेंद्र नारायण कोटियाल डॉ सुशील बडोनी, डॉ सुधांशु वर्मा डॉ अरविंद सिंह गौर, डॉ सुरेश शर्मा, डॉ गणेश्वर नाथ झा, डॉ सूर्यमणि भंडारी इत्यादि उपस्थित थे।

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