शास्त्रों पर परिसंवाद की स्वस्थ परंपरा का आरंभ, रघुनाथ कीर्ति में वैयाकरणों ने किया ‘प्रक्रम’ शब्द पर विमर्श
शास्त्रों पर परिसंवाद की स्वस्थ परंपरा का आरंभ, रघुनाथ कीर्ति में वैयाकरणों ने किया ‘प्रक्रम’ शब्द पर विमर्श
देवप्रयाग। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में संस्कृत शास्त्रों पर स्वस्थ विमर्श की नई परंपरा का आरंभ किया गया है। इसके अंतर्गत परिसर स्थित धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज वेदशास्त्र अनुसंधान केन्द्र के तत्त्वावधान में एक परिसंवाद सभा का आयोजन किया गया। ‘चत्वारिशृंगा: त्रयो अस्य पादा इत्यस्मिन् मन्त्रे प्रयुक्तत्रिधाबद्ध’ विषय पर आयोजित इस सभा में परिसर के साहित्य विद्याशाखा के वरिष्ठ आचार्य प्रो.विजयपाल शास्त्री तथा व्याकरण विद्या शाखा के सहायक आचार्य डॉ.गणेश्वरनाथ झा ने प्रतिभाग किया। इस अवसर पर निदेशक प्रो. पीवीसी सुब्रह्मण्यम समेत अनेक आचार्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम में अनेक विद्वान आनलाइन भी जुड़े रहे। कार्यक्रम का निष्कर्ष यह रहा कि वैयाकरण सिद्धांत कौमुदी में एक स्थान पर आए ‘प्रक्रम’ शब्द का आशय उच्चारण स्थान ही है।

प्रो. विजयपाल शास्त्री जी को ‘उच्चैरुदात्तः’ इत्यादि सूत्रों की वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदीस्थ वृत्ति ‘ताल्वादिषु सभागेषु’ इत्यादि पर आपत्ति थी। उनका कहना था कि किसी भी प्रामाणिक आचार्य ने उदात्तादि के प्रसङ्ग में इस प्रकार स्पष्ट रूप से ‘उच्चारणस्थानों’ का उल्लेख नहीं किया है, अतः कौमुदी का उक्त विवेचन अप्रामाणिक है। सभा में डॉ.गणेश्वरनाथ झा ने ‘उच्चैरुदात्तः’ सूत्रस्थ भाष्यवचन ‘कः पुनः प्रक्रमः? उरः कण्ठः शिर इति’ को प्रस्तुत किया कि उक्त वाक्य में ‘अधिकरणघञन्त प्रक्रम’ शब्द का अर्थ उच्चारणस्थान ही है। इस पर प्रो.विजयपाल शास्त्री ने पाणिनीय शिक्षा का वचन उद्धृत करते हुए कहा- स्थानमिदं करणमिदं,प्रयत्न एष द्विधानिलः।
स्थानं पीडयति वृत्तिकारः, प्रक्रम एषो$थ नाभितलात्।।
इस वचन में प्रक्रम शब्द का अर्थ प्रयत्न है अतः ‘कः पुनः प्रक्रमः?’ इत्यादि भाष्यवचन में भी ‘प्रक्रम’ शब्द का अर्थ प्रयत्न ही लेना चाहिए, न कि उच्चारणस्थान।

इस पर डॉ.झा ने कहा कि यदि उक्त भाष्य के ‘प्रक्रम’ शब्द का अर्थ प्रयत्न किया गया तो ‘भाष्यप्रयुक्त प्रक्रम’ इस शब्द का आगे प्रयुक्त ‘कण्ठादि’ के साथ अभेदान्वय नहीं हो पायेगा। क्योंकि कण्ठादि प्रयत्न अर्थात्- क्रिया नहीं हैं, द्रव्य हैं एवं क्रिया एवं द्रव्य में अभेद बाधित है। चूंकि भाष्य के उक्त व्याख्यान (कः पुनः प्रक्रमः?उरः कण्ठः शिर इति) अर्थात्-कण्ठः प्रक्रमः, शिरः प्रक्रमः, उरः प्रक्रमः) से सर्वथा स्पष्ट है कि महाभाष्यकार ‘प्रक्रम’ एवं ‘कण्ठादि’ में अभेद ही स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में यहां ‘प्रक्रम’ शब्द का अर्थ ‘उच्चारणस्थान’ करना ही महाभाष्यकार को भी अभीष्ट है। अतः इस ‘भाष्यवाक्य’ में ‘प्रक्रम’ शब्द के उच्चारणस्थानवाचक होने से कौमुदी की वृत्ति सर्वथा भाष्यसम्मत है। इस पर प्रो. विजयपाल शास्त्री निरुत्तर दिखे, जिससे स्पष्ट हो गया कि वे भी यहां पर प्रक्रम शब्द का अर्थ, उच्चारणस्थान ही स्वीकार कर रहे हैं। 
डॉ.झा ने कहा कि पाणिनीय शिक्षा के ‘प्रक्रम’ शब्द की जहां तक बात है तो वह करणघञन्त होने के कारण प्रयत्न अर्थ का वाचक है, जो सर्वसम्मत है।
इस प्रकार यह सुस्पष्ट हो गया कि ‘कः पुनः प्रक्रमः? उरः कण्ठः शिरः इति’ इस ‘उच्चैरुदात्तः’ सूत्रस्थ भाष्य में प्रयुक्त ‘प्रक्रम’ शब्द का अर्थ ‘उच्चारणस्थान’ ही है, न कि प्रयत्न।
