सभी समस्याओं का समाधान है भगवत गीता, केंद्रीय संस्कृत विवि, श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में छात्रों की तीन दिवसीय संगोष्ठी
सभी समस्याओं का समाधान है भगवत गीता, केंद्रीय संस्कृत विवि, श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में छात्रों की तीन दिवसीय संगोष्ठी
देवप्रयाग। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में श्रीमद्भगवत गीता पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न संस्थानों के छात्रों ने मानवजीवन की सफलता में गीता का महत्त्व प्रतिपादित किया। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज वेदशास्त्रानुसंधानकेंद्र के तत्त्वावधान ’श्रीमद्भगवद्गीताज्ञानसत्रम्’ विषय पर में आयोजित इस तीन दिवसीय सेमिनार में छात्रों ने कहा कि गीता हमारे विभिन्न मानसिक रोगों के उपचार में ही सहायक नहीं है, अपितु वह जीवन को लोभ-मोहरहित होकर जीने की प्रेरणा भी देती है। यह महान ग्रंथ इस लोक और परलोक का सुगम मार्ग प्रशस्त करता है। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में आयोजित इस संगोष्ठी में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पर रहने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार दिये गये।

उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि ज्वाल्पादेवी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ0 ममता मेहरा ने कहा कि गीता का प्रथम शब्द ’धर्म’ और अंतिम शब्द ’मम’ है। यह ग्रंथ हमें धर्म की उचित परिभाषा बतलाते हुए जीवन यापन करने का अकुलषित मार्ग बताता है। गीता सिखाती है कि कुछ सीखने के लिए शरणागत होना होगा, अनिश्चितता और भय तो त्यागना होगा। गीता का कर्मयोग हमें परिश्रम और ईमानादारी की सीख देता है। गीता सिखाती है कि हर कर्म धर्मयुक्त होना चाहिए। इससे पहले बीज भाषण में सारस्वत अतिथि डॉ0 गणेश्वर नाथ झा ने कहा कि गीता में धर्म के लक्षणों की श्रेष्ठ व्याख्या की गयी है। इस ग्रंथ से प्रेरणा मिलती है कि धर्म हमारी विपरीत बुद्धि को सद्मार्ग पर ले जाता है। जहां धर्म है, वहां विजय निश्चित है। न्यायविभाग संयोजक डॉ0 सच्चिदानंद स्नेही ने प्रास्ताविक प्रस्तुत करते हुए कहा कि गीता सनातन धर्म का महान पूजनीय ग्रंथ है। अन्य संप्रदाय के लोग भी इससे प्रेरणा लेते हैं। गीता एक जीवनदर्शन है। विशिष्ट अतिथि सहनिदेशिका प्रो0 चंद्रकला आर0 कोंडी ने कहा कि गीता में मोक्ष के मार्ग को बेहतर ढंग से परिभाषित किया गया है। मनुष्य जन्म की सार्थकता व्यक्त करते हुए इस ग्रंथ में मानव जीवन की सफलता के मजबूत सूत्र भी प्रदान किये गये हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिसर निदेशक प्रो0 पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि हर वर्ग के मनुष्य के लिए गीता का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। छात्रों को तो इसका विशेष अध्ययन करना चाहिए। गीता निराशा से आशा की ओर ले जाती है। यह सकारात्मक चिंतन के लिए प्रेरित करती है। गीता ही ऐसा ग्रंथ है जो इस संसार की बेकार की उलझनों और झंझटों से मुक्ति की बात बताती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ0 जनार्दन सुवेदी ने किया। समापन कार्यक्रम की मुख्य अतिथि देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार की दर्शनविभागाध्यक्षा डॉ0 शशिकला साहू ने कहा कि गीता स्वयं में अथाह और असीमित ज्ञान का भंडार है। यह मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्य का प्रतिबिंबन कराती है। इस अवसर पर सारस्वत अतिथि वेद प्राध्यापक डॉ0 शैलेंद्र प्रसाद उनियाल रहे। डॉ0 शैलेंद्रनारायण कोटियाल ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रतिवेदन डॉ0 अनिलकुमार ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सहनिदेशिका प्रो0 चंद्रकला आर0 कोंडी ने की। इस अवसर पर साहित्य विभाग की तीन पुस्तकों-काव्यहेतुविमर्श:, साहित्यसंवेदिनी तथा गीताsमृतधारा का विमोचन भी किया गया।

तीन दिवसीय संगोष्ठी में छात्रों ने गीता में अभिव्यक्त कर्मयोग, भक्तियोग, दर्शन, अध्यात्म पर शोधपत्रों के माध्यम से विचार व्यक्त किये। छात्रों ने कहा कि गीता सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं का समाधान है। यह मानव जीवन को उच्चता की ओर ले जाने का मार्ग आलोकित करती है।

ऑफलाइन पत्र प्रस्तुतिकरण में श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर की प्राक्शास्त्री द्वितीय वर्ष की तनस्वी प्रथम, शास्त्री के आयुष त्रिवेदी द्वितीय तथा आचार्य की ऋतिका पाल तृतीय रहीं। ऑनलाइन पत्र प्रस्तुतिकरण में पतंजलि गुरुकुलम, देवप्रयाग की नंदिनी भट्ट प्रथम, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के शास्त्री के अभिषेक द्वितीय तथा भगवानदास आदर्श संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य के छात्र मंदीप सिंह तृतीय रहे। इन्हें पुरस्कृत किया गया।
निर्णायकों में डॉ0 वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल, डॉ0 श्रीओम शर्मा, अंकुर वत्स,डॉ0 सुशील प्रसाद बडोनी, डॉ0 गणेश्वरनाथ झा, डॉ0 अनिल कुमार, डॉ0 सुमिति सैनी, डॉ0 रश्मिता, डॉ0 सुरेश शर्मा, डॉ0 पीवी धनेश, डॉ0 दीपक कोठारी, डॉ0 सोमेश बहुगुणा, रजत गौतम छेत्री, डॉ0 दीपक पालीवाल तथा संचालकों में पायल पाठक, डॉ0 सुमन रावत, पंकज कोटियाल, किशोरी राधे शामिल थीं।
