Saturday, September 7, 2024
उत्तराखंडशिक्षा

जेठ में पूस जैसी कंपकंपी छुड़ा दे, वही असली साहित्य, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग में साहित्य विभाग की पांच दिवसीय कार्यशाला

जेठ में पूस जैसी कंपकंपी छुड़ा दे, वही असली साहित्य, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग में साहित्य विभाग की पांच दिवसीय कार्यशाला

देवप्रयाग। साहित्य हृदय का विषय है। असली साहित्यिक रचना वह है,जो आपके हृदय को अपने अनुकूल ढालने में सफल हो सके। इसे साहित्य की भाषा में साधारणीकरण कहते हैं।
यह बात केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के साहित्य विभाग की कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कही।
यह पांच दिवसीय कार्यशाला ‘शास्त्र-काव्यनिबन्धलेखनम्’ विषय पर आधारित है। इसके उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ.निरंजन मिश्र (पूर्व प्राचार्य, श्री भगवान दास संस्कृत महाविद्यालय हरिद्वार) थे। उन्होंने कहा कि संस्कृत के अध्येताओं को भले ही कुछ लोग हीन भावना से देखें, परंतु वस्तुस्थिति यह है कि इस क्षेत्र में परिश्रम और निष्ठा से अध्ययन करने वालों के सामने रोजगार की कमी नहीं है। संस्कृत की बाहर की दुनिया के लोग इसका महत्त्व न समझें, परंतु यह बड़ा सच है कि संस्कृत पढ़ने वाले सौभाग्यशाली होते हैं। उन्होंने छात्रों को काव्य, निबंध इत्यादि साहित्यिक रचनाओं के लेखन की बारीकियां समझाते हुए बताया कि संस्कृत में कवि तो बहुत सारे हुए हैं, परंतु प्रसिद्धि कालिदास जैसे लोगों को इसलिए मिली कि उनका काव्य पाठकों के हृदय में गहरी पैठ बनाने में सफल रहा। यही रचनाकार का धर्म और कर्तव्य है। जिस रचना में रचनाकार लेखन के माध्यम से डूबता नहीं, पाठक भी उस रचना में नहीं डूब सकता। तुलसी ने ‘स्वांत: सुखाय’ के लिए राम काव्य लिखा,उसमें डूबे तो पाठक में उसमें डूबे जाते हैं। प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ को पढ़कर जेठ में भी कंपकंपी छूट जाती है, इसलिए ऐसा लेखन श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा कि कोई कितना लिखता है,यह महत्त्वपूर्ण नहीं,कोई कैसा लिखता है,यह महत्त्व रखता है।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्य विभाग की संयोजक प्रो.चंद्रकला आर.कोंडी ने कहा कि काव्य केवल छंदबद्धत और अलंकार युक्त रचना ही नहीं, बल्कि वह समस्त वाक्य काव्य है,जिसमें रस होता है। प्रत्येक रचना में लेखक का अनुभव, आनंद, सुख-दु:ख,हर्ष-विषाद और भावना समाहित होती है। साहित्य ‘सत्यं शिवम् सुंदरम्’ होता है। साहित्य में सत्य को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना आनंददायक होता है, परंतु आवश्यकता से अधिक अतिशयोक्ति हास्यास्पद बन जाती है।


संयोजक डॉ.अनिल कुमार ने कहा कि साहित्यिक रचनाओं के लेखन और वर्णन-विश्लेषण, समीक्षा में प्रमाण बहुत महत्त्व रखते हैं। इससे लेखन में स्पष्टता आती है और पुष्टि होती है।
कार्यक्रम में डॉ.शैलेंद्र नारायण कोटियाल, डॉ.सुशील प्रसाद बडोनी, डॉ.दिनेशचंद्र पांडेय, डॉ.शैलेंद्र प्रसाद उनियाल, डॉ.ब्रह्मानंद मिश्र, डॉ.अरविंदसिंह गौर, डॉ.सुरेश शर्मा, डॉ.आशुतोष तिवारी, डॉ.श्रीओम शर्मा,पंकज कोटियाल, डॉ.धनेश, डॉ.रश्मिता, डॉ.मनीषा आर्या, डॉ.अमंद मिश्र, जनार्दन सुवेदी आदि उपस्थित थे।
(डॉ.वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल, जनसंपर्क अधिकारी)

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